मेरा बचपन पर निबंध – My Childhood Essay in Hindi

मेरा बचपन झारखंड राज्य की एक छोटी सी पहाड़ी वाला गांव में बीता है, बचपन में मैं अपने दोस्तों के साथ अक्सर छुट्टियों के दिनों में अपने बैल बकरियों को लेकर घर से दूर पहाड़ियों पर हरी घास चढ़ाने के लिए ले जाया करता था।

जब भी हम अपने दोस्तों के साथ ऊंची पहाड़ी पर जाते थे तो हम लोग जोर-जोर से चिल्लाते थे, और खूब मस्तियां किया करते थे, और अलग-अलग मौसमों में अलग-अलग प्रकार की जंगली फलों का स्वाद लिया करते थे।

मैं और मेरे दोस्त बहुत ही शरारती थे, हमलोग अक्सर अपने गांव के आम के बगीचे में, जाकर आम के पेड़ों में अंधाधुंध पत्थर चलाया करते थे, जिसके कारण पके आम बहुत कम और कच्चे आम बहुत ज्यादा गिरकर ढेर हो जाया करता था।

जब माली को पता चलता था कि बच्चे कच्चे आम बर्बाद कर रहे हैं, तो वह बहुत बड़ा डंडा लेकर हमारे पीछे भागे आता था, और हम लोग झटपट वहां से दुम दबाकर निकल लेते थे, लेकिन हमेशा हमारी किस्मत फूटी रहती थी।

माली हमारे घर जाकर शिकायत कर दिया करता था और हमें घर में शाम के समय, मोटे डंडे से बेहतरीन ढंग से पिताजी के द्वारा स्वागत किया जाता था, तब हमें अपने किए पर बहुत ही पछतावा हुआ करता था।

बचपन में “मां” की ममता

बचपन में हर कोई हमेशा कुछ ना कुछ गलत काम करते रहता है, मैं भी उसी में से एक था जो हमेशा कभी न कभी गलत काम कर ही देता था, कभी कोई सामान तोड़ देता था तो कभी मम्मी के बैग पैसे चुरा लिया करता था, जब मैं छोटा था तो मुझे चॉकलेट खाने की लत लग गई थी।

जिसके कारण मैं हफ्ते में एक दो बार अपने मम्मी के हैंडबैग से अक्सर कुछ पैसे चुरा लिया करता था, लेकिन यहां पर भी मेरी फूटी किस्मत मुझे साथ नहीं देती थी, मैं हर बार पकड़ा जाता था, लेकिन मां बहुत ही भोली थी, मेरी शिकायत कभी भी किसी से नहीं करती थी।

लेकिन डराती जरूर थी, कहती थी कि तुम्हारा शिकायत तुम्हारे टीचर और पापा से कर दूंगी जिससे तुम्हें डंडे पड़ेंगे, और तो और तुम्हारे सभी दोस्तों को भी बता दूंगी कि तुम चोरी करते हो, मुझे कोई चोर कहे यह मुझसे बर्दाश्त नहीं होता इसीलिए मैंने समय रहते ही चोरी करने की आदत छोड़ दी।

जब मैं घर का कोई भी सामान तोड़फोड़ कर देता था या कोई भी गड़बड़ काम कर देता था तो, मैं पिताजी के डर से शाम के समय में अपने घर के अलमारी या बक्से की पीछे छिप जाया करता था, और मैं बिल्ली की तरह म्याऊं म्याऊं की आवाज लगाया करता था, क्योंकि मेरे घर में एक बिल्ली है, जिससे किसी को पता नहीं चाहता था कि बिल्ली की तरह मैं ही म्याऊं म्याऊं की आवाज लगा रहा हूं।

लेकिन मेरी मां मेरी आवाज को पहचान लेती थी और मेरे लिए खाना लेकर आती थी, और मैं वहीं पर खाना खाकर सो जाया करता था और और मैं जब सो जाता था तो मम्मी मुझे चादर से ढक दिया करती थी।

जब मेरी पिताजी मेरे बारे में पूछते थे, तो बोल देती थी कि आपके डर से अपने दोस्त के घर चला गया है, और मैं सुबह सवेरे जल्दी उठकर स्कूल ड्रेस पहन कर अपने बैग पैक कर स्कूल चल जाया करता था, बिना खाए पिए लेकिन मां को पता होता था कि मैं बिना खाना खाए पिए ही स्कूल चला गया हूं इसीलिए मेरी मां मेरे लिए मेरे दोस्तों से दोपहर का लंच भेज दिया करती थी।

और जब मैं शाम को स्कूल से घर पहुंचता था तो तब तक पिताजी का गुस्सा ठंडा हो जाता था, और मैं इस तरह से पिताजी के डंडे खाने से बच जाता था।

लेकिन मैंने बचपन में कई बार अपने पिताजी से बहुत ठंडे खाए हैं, क्योंकि मेरा एक छोटा भाई भी है जो बहुत ही शातिर है, हम दोनों के बीच में बचपन में अक्सर कभी भी नहीं बनती थी, हम लोग एक दूसरे के साथ छोटी-छोटी बातों को लेकर झगड़ते रहते थे, जिस वजह से मेरा छोटा भाई बेवजह मेरे पिताजी से मेरी शिकायतें किया करता था और मुझे डंडे खिलवाया करता था।

जब मुझे पिताजी के डंडे पड़ते थे तो मेरे छोटे भाई के चेहरे पर जो खुशियां झलकती थी उसे देखकर लगता था कि मानो उसे कोई स्वर्ग मिल गया हो, लेकिन मुझे उसके चेहरे पर झलकती खुशियां बर्दाश्त नहीं होती और मैं उसे कभी-कभी जोरो की थप्पड़ो से स्वागत कर दिया करता था।

उपसंहार

हर किसी का बचपना अलग-अलग तरह से बितता है, कोई अपने बचपन में ढेर सारी खुशियां बटोरता है, तो कोई अपने बचपन में मुसीबतों का पहाड़ों तले दब जाता है, और अपने बचपन की सारी खुशियां लुटा देता है।

बचपन की अच्छी यादें हमेशा हमें इमोशनल कर देती है, जब हम दुखी होते हैं तो हमारे बचपन की ताजा यादें हमारे चेहरे पर असली मुस्कान ला देती है।

मैंने अपने बचपन में मुसीबतें कम खुशियां ज्यादा देखी है, लेकिन मेरे बचपन में सबसे ज्यादा खुशियां मेरी मां की वजह से ही रही है, मैंने अपनी मां को बहुत करीब से मेरे ऊपर आए मुसीबतों को टालते हुए देखा है।

जब मैं अपने बचपन की यादों को टटोल कर देखता हूं, तो सबसे पहले मुझे मेरी “मां” याद आती है, उसके बाद मेरे बचपन के प्यारे दोस्तों, जो एक दूसरे के लिए जीने मरने तक के लिए तैयार थे।

मेरी “मां” ने मेरा बचपना को खुशियों से भरने के लिए हर वो काम की है, जिससे मुझे खुशियां मिल सकती थी, और मैंने अपनी मां को इस काम को करते हुए बहुत करीब से देखा है, इसलिए मैं अपनी मां को मेरा बचपन को खुशियों से भरने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद!

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